पूर्वपीठिका
1. नमस्कार! मैं राघवेंद्र प्रपन्न आप सभी का बहुत-बहुत स्वागत करता हूँ ,खैर मकदमकरता हूँ- यूट्यूब चैनल अपनी पगडंडी पर ।दोस्तों !पिछले वीडियो में ‘एक शाम पुरखों के नाम ‘ श्रंखला के तहत हिंदुस्तान के महान विभूति अश्वघोष एवं कनिष्क की कथा आपने सुनी होगी ।’एक शाम पुरखों के नाम’ के इस कड़ी में आज हम हिंदुस्तान के उस शख्सियत की कहानी लेकर आए हैं जिनको विद्वानों की एक सभा में बैठ जाने की वजह से गला पड़कर धक्का देते हुए अपमानजनक शब्दों से उनकी अंतरात्मा को छीलते हुए बाहर धकेल दिया गया। बाद में चलकर इसी शख्सियत ने एक नहीं, दो नहीं, ज्ञान की कम से कम 10 अलग-अलग परंपराओं में न केवल उच्च चोटी का ज्ञान हासिल किया बल्कि, ज्ञान की अलग-अलग परंपराओं में ऐसे- ऐसे ग्रंथ लिखे कि उनकी रचनाओं के नाम से युग को पहचाने जाने लगा। जानते हैं हिंदुस्तान के सरजमीं पर पैदा हुआ यह शख्सियत कौन है ?इस महान विभूति का नाम है- वैयाकरणिक आचार्य नागेश भट्ट । आप जानते होंगे कि महान वैयाकरणिक महर्षि पाणिनि ने सर्वकालिक व्याकरण शास्त्र का संदर्भ ग्रंथ रचा – ‘अष्टाध्यायी। इस ग्रंथ को समझ की धरातल पर उतारने के लिए महान विद्वान पतंजलि ने उस पर महाभाष्य लिखा। यह महाभाष्य 84 वॉल्यूम में है।
अच्छा एक बात बताएं ।आपको यदि एक बहुत अच्छा लेख दिया जाए, जो खूब गहरा हो, बड़ी बात खोलता हो और केवल 100 पन्ने का हो तो उसे समझने के लिए आप कितना प्रयास करेंगे? समझने के प्रयास में आप उसे कितनी बार पढ़ेंगे?
यानि पहले पठन में कुछ समझ में आया, दूसरी पठन में थोड़ा और ,तीसरे पठन में और तो ऐसा करते-करते आप कितने पठन तक जाएंगे ?पांच बार, सात बार ,पर आप कल्पना करो कि अष्टाध्यायी पर पतंजलि द्वारा लिखा गया भाष्य जो की 84 वॉल्यूम में है, इस इतने बड़े ग्रंथ को नागेश भट्ट ने 21 बार तो गुरुमुख से अध्ययन किया। खुद कितनी बार पढा होगा, कितना स्वाध्याय किया होगा कोई नहीं जानता।
2.हर होनहार बिरवान के होत न चिकने पात:
आप मे से कोई लोग जो बच्चियों /बच्चों के मां-बाप,भाई-बहन,दादा-दादी,नाना-नानी,चाचा-मामा,मौसी-बुआ या फिर बच्चियों/बच्चों के दोस्त या शिक्षक हो सकते हैं।अगर हां तो आप में से बहुत इस बात से परेशान , दुःखी अथवा गुस्से में होगें कि आजकल दिखावे की संस्कृति,ग्राहक खींचु संस्कृति या लैगों अपनी झूठी उपलब्धि के मायाजाल में फंसाने के चक्कर में स्कूल कुछ अंक खीचूँ विद्यार्थियों का अलग समूह बनाकर उन्हीं बच्चों पर अपने सारे संसाधन झोंक देते हैं.ताकि उस स्कूल को हाई एचीभमेंट वाला स्कूल दिखाया जा सके। इस क्रम में अपेक्षाकृत कम अंक खींचु विद्यार्थी उपेक्षा के शिकार हो जाते हैं। ऐसी मान सिकता केवल स्कूलों की उपज नहीं हैं बल्कि समाज में इसकी जडे बहुत अंदर तक है।समाज मे प्रचलित है-’होनहार बिरवान के होत चिकने पात।# और यह भी कि ‘सपूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं।’
आपने कभी यह सोचा है कि इस तरह की औपचारिक-अनौपचारिक मान्यताएं,धारणाएं,स्थापनाएं समाज के मानस को किस तरह से प्रभावित करते है? बचपने पर किस तरह का नकारात्मक प्रभाव डालते है? बच्चियों पर लगाए जाने वाले प्रयासों को कैसे सिकोड़ कर रख देते है?दरअसल इस तरह की रूढि एक तरह के निर्धारणवाद को बढावा देते है।
मतलब यह है कि इस कहावत में यह मान्यता छुपी हुई है कि कुछ लोग बचपन से ही प्रतिभाशाली होते हैं। इस मान्यता में वे तमाम बच्चे उपेक्षित हो जाते हैं ,गैर- संभावनाशील मान लिए जाते हैं जिनके बचपन में विलक्षणता के कोई लक्षण नजर नहीं आते।नतीजा यह होता है कि गैर विलक्षणशील,यानि साधारण माने जाने वाले बच्चों पर न तो कोई ध्यान देता है नहीं उन पर अपना संसाधन और कोशिश ही लगाना चाहता है। होनहार बिरवान के होत चिकने पात जैसी धारणाएं प्रतिभा, शिक्षा, प्रयत्न और संसाधन आवंटन के विषय में एक तरह की रूढ़ि रचते हैं, एक तरह के निर्धारणवाद का फंदा डालते हैं, जिसकी चक्की में पिसते हुए बाकी के बच्चे -बच्चियां, ध्यान न दिए जाने ,संसाधन और प्रयत्न का प्रवाह उनकी तरफ न होने के कारण एक तरह के सुखे के शिकार हो जाते हैं।
आप सोच रहे होंगे कि नागेश भट्ट जैसे कई ज्ञानपरंपराओं के विद्वान का बालपन अद्भुत रहा होगा। इस प्रसंग में नागेश भट्ट का बचपन जानना विलक्षणतावाद के इस घटाटोप से हमें बाहर निकलने में मदद कर सकता है। तो चलिए सुनते हैं नागेश नागेश भट्ट के बचपन के बारे में जो बाद में चलकर ज्ञान की 10 अलग-अलग परंपराओं में ऊद्भट्ट विद्वान निकले। नागेश भट्ट का बचपन कहीं से यह नहीं बतलाता कि उनका बचपन किसी तरह के विलक्षणता से जुड़ा था। नागेश भट्ट 16 साल की उम्र तक तो गाए चराते रहे, उसका दूध निकालते रहे पहलवानी करते रहे। इस रूप में उनका अध्ययन -अध्यापन से कोई खास रिश्ता नहीं रहा और केवल पहलवानी में संलग्न रहे। इस तरह से कहा जा सकता है कि 10 अलग-अलग ज्ञान परंपराओं के विद्वान का बचपन में किसी तरह की विलक्षणता नजर नहीं आती।
3.घोर अपमान की सकारात्मक ऊर्जा में तब्दीली :
घनघोर अपमान में अधिकतर हमारे साथ क्या होता है? हम बिलबिला उठाते हैं ,मानसिक अवसाद में चले जाते हैं, अभी के समय में तो इसके भी कई उदाहरण यह भी मिलते हैं कि अपमान से हम इतना हिल जाते हैं कि अपना जीवन ही मिटा लेते हैं। उच्च शिक्षा संस्थानों में हाल की कई घटनाएं इसके उदाहरण हैं। इतिहास में भी ऐसे कई उदाहरण हमें मिलते आए हैं।
पर आज मैं आपको एक ऐसी कथा सुनाने जा रहा हूँ जिसमेँ वैयाकरणिक नागेश भट्ट ने अपमान को चट्टानी प्रेरणा बनाकर खुद को श्रेष्ठतम के कतार ला खडा कर दिया।कथा यह है कि 16 वर्ष की उम्र तक गाय चराने वाले नागेश भट्ट, कुश्ती -पहलवानी करने वाले नागेश भट्ट को एक शौक चर्राया। शौक है कि वे विद्वानों की सभा में जाकर बैठें। एक दिन विद्वानों की ऐसी ही सभा -गोष्ठी हो रही थी। नागेश भट्ट ने अपने शौक को पूरा करने के लिए इसे एक अवसर के रूप में देखा। उन्होंने उस समय में
विद्वानों द्वारा पहने जाने वाले वस्त्र को धारण कर,वैसी ही रूपरेखा बनाकर जा बैठे विद्वानों की सभा में ।विद्वानों ने पहचान लिया कि यह कोई विद्वान नहीं बल्कि विद्वान का स्वांग पूर्वक वेश धारण करके यहां बैठा आदमी दरअसल एक मूर्ख है। फिर क्या था ।उस समय ऐसी घटना के लिए जो दंड दिया जाता था वही दंड उन्होंने नागेश भट्ट को भी दे डाला। दंड यह कि उनका गला पड़कर सभा के बीचो-बीच से उठा लिया गया और गला पकडे-पकडे ही उन्हें बेइज्जत करने वाले, छीलने वाले शब्दों के बौछार के बीच धक्का देते हुए सभा से बाहर धकेल दिया गया। इस न्याय दंड को ‘चंद्राधर न्याय दंड’ कहा जाता था। इस अपमान ने उन्हें चोटिल तो किया, घायल तो किया, अंदर छीलकर तो रख दिया पर इससे वो बिखर कर टूट नहीं गए ,बर्बाद नहीं हो गए ,खुद को खत्म करने की कोई कोशिश नहीं की बल्कि वह निश्चय किया जिसने उनकी जिंदगी को 360 डिग्री पलट कर रख दिया वह भी रचनात्मक रूप से सकारात्मक रूप से ।अपमान से निकले इस व्यक्तित्व ने अपमान को सकारात्मक ऊर्जा में तब्दील कर दिया जिसका फल आज भी समाज चख रहा है,ज्ञान रूपी फल। परिणाम यह था कि उन्होंने आगे चलकर एक नहीं दो नहीं, बल्कि ज्ञान की कम से कम 10 अलग-अलग परंपराओं में वो श्रेष्ठ रचनाएं की जिसे आज भी श्रेष्ठ और उत्तम रचना माना जाता है।
4. भीष्म प्रतिज्ञा ही नहीं ज्ञान की प्रतिज्ञा भी :
आपने सुना होगा, भीष्म प्रतिज्ञा के बारे में। भीष्म प्रतिज्ञा के संबंध में आप देखते हैं कि यह हस्तिनापुर के लिए था ।पिता के प्रेम में पड़कर किया गया था। हममें से भी बहुत लोग, कई बार,कई तरह की प्रतिज्ञा करते हैं। अकसर किस तरह की प्रतिज्ञा? प्रतिज्ञा यह कि मैं अपनी गाड़ी में लाल बत्ती जबतक नहीं लगा लेता, रुकूंगा नहीं।कोई यह प्रतिज्ञा करता है कि मैं अपने दुश्मन का खात्मा करके ही दम लूंगा। कोई यह प्रतिज्ञा करता है कि मैं गांव- जवार, शहर में सबसे भव्य मकान खड़ा करके ही मानूंगा आदि -इत्यादि। अगर आप गौर करें तो इस तरह की प्रतिज्ञाओं का एक मिजाज है । अगर आप ध्यान देगें तो पाएंगे कि इस तरह की प्रतिज्ञाएं भौतिक लाभ के लिए हैं, धमक के लिए है, दबदबा बनाने के लिए है ।पर आपने ऐसी प्रतिज्ञा शायद ही सुनी होगी जिसमें भौतिक लाभ न हो बल्कि ज्ञान के प्रति लगन हो।
आज हम एक ऐसी ही प्रतिज्ञा के बारे में सुनते हैं। तो हुआ यह कि किशोर नागेश भट्ट इस अपमान से जिसे विद्वानों की सभा में ‘अर्थचंद्राधर न्याय दंड’ कहा जाता है, जब गला पकड़ कर अपमानजनक शब्दों से उन्हें छिलते हुए सभा से बाहर धकेल दिया गया तब उन्होंने एक प्रतिज्ञा ली। प्रतिज्ञा किसी भौतिक उपलब्धि के लिए नहीं ,कोई चीज हासिल करने के लिए नहीं ,कोई पद हासिल करने के लिए नहीं बल्कि ज्ञान के लिए। प्रतिज्ञा यह थी,”शरीरं पातयामि वा पंडिताग्रत्वं साधयामि वा” मतलब यह कि या तो अब मैं खुद को विद्वानों की सबसे अगली पंक्ति में बैठने के काबिल बना कर छोड़ूंगा या फिर यह शरीर ही जाएगा। सरल मतलब यह कि अब यह नहीं हो सकता कि मैं जिंदा भी रहूं और विद्वानों की सबसे अगली पंक्ति में बैठने के काबिल भी न रहूं।
5. ज्ञान के लिए तपस्या
जब नागेश भट्ट को विद्वानों की सभा में हंसी उड़ाते हुए ‘अर्द्ध चंद्राधर न्याय के तहत यानी गला पकड़ कर धक्का देकर, सभा से बाहर कर दिया गया तो इस अपमान से दुखित होकर उन्होंने अपने मूर्खता के भाव का नाश करने के लिए भगवती बागेश्वरी देवी की साधना करने लगे। इस में साधना उन्होंने सोना ,विश्राम करना ,सब छोड़ दिया। उनकी इस साधना से प्रसन्न होकर भगवती वागेश्वरी ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा , “ तुम योग्य गुरू के पास जाकर शास्त्रों का अध्ययन करो। तुम बहुत ही कम समय में व्याकरण आदि सभी शास्त्रों में पारंगत होकर विद्वानों की सबसे अगली पंक्ति में बैठने के काबिल हो जाओगे।”
6.नागेश भट्ट की रचनास्थली:
जानते हैं! नागेश भट्ट ने अपनी रचनाएं किस जगह पर बैठकर की । वैयाकरणिक नागेश भट्ट काशी नगरी के सिद्धेश्वरी नमक महालय के अंतर्गत एक कश्मीरी व्यायाम शाला के पास जो एक प्रसिद्ध महाजन का विशाल भवन था उसके पास अपने घर में रहकर उन्होंने अध्ययन -अध्यापन किया और रचनाओं को जन्म दिया।
7.अध्ययन अनुराग और उद्योग :
आमतौर पर आजकल देखा जाता है कि मौलिक लेखो, किताबों ,शोध पत्रों का पठन धीरे-धीरे गिरता ही जा रहा है। लोग ज्यादा से ज्यादा संक्षिप्त और सरलीकृत रूप देखना चाहते हैं ।किसी मूल रचना पर जाने की जगह अमूमन लोग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से मौलिक रचनाओं का सरलीकरण, संक्षेपीकरण करवाना चाहते हैं। यह एक तरह से विचारों की गंभीरता और जटिलताओं से बच निकलने का सुविधावाद है।इस रूप में वैयाकरणिक नागेश भट्ट को जानना ज्ञान की एक वैकल्पिक दुनिया में जाना होगा। नागेश भट्ट के बारे में यह कथा प्रचलित है कि उन्होंने पतंजलि द्वारा रचित 84 वॉल्यूम के महाभाष्य को गुरु के मुख से 21 बार श्रवण किया । अर्थ की गंभीरता में उतरने के लिए नागेश भट्ट ने कितना स्वाध्याय किया होगा, कोई नहीं जानता। ऐसे समय में जिसको कहा यह जा रहा है कि यह एक अपठितता और कुपठिता का दौर है, वैयाकरणिक नागेश भट्ट जैसे मौलिक ग्रंथों के लगनशील अध्ययन प्रेमी को याद करना उस प्रवृत्ति को सींचना है जिससे आम इंसान उत्साहित और प्रेरित होकर मौलिक स्रोतों पर जाए,उसका अध्ययन -अध्यापन करें ताकि ज्ञान पर झूठी अधिकारिता का भ्रम पैदा न हो बल्कि उसे पर सच्ची पकड़ हो।
8.दरिद्रता के आगे ज्ञान की जीत
वैयाकरणिक नागेश भट्ट के संबंध में एक प्रसिद्ध कथा यह है कि एक बार एक धनदाता नागेश भट्ट के पास आए
और उन्होंने नागेश भट्ट की आर्थिक दशा को देखते हुए कुछ आर्थिक मदद की पेशकश की ।
इस पर नागेश भट्ट गंभीर होकर कुछ सोचने लगे। कुछ क्षण चिंतन के बाद उन्होंने अपने पास पड़े एक भग्न पांडुलिपि को उठाकर उसकी एक पंक्ति को इंगित करते हुए दानदाता से कहा ,”मैं इसकी एक पंक्ति का अर्थ साध नहीं पा रहा हूं ,क्या इसका अर्थ आप समझा देगें।जानते हैं वे दाता कौन थे? वे थे श्रृंगवेरपुर के राजा, श्री राम सिंह ।महापंडित कि इस प्रतिपत्ति को सुनकर राजा ने कहा कि इस समस्या का निराकरण वे नहीं कर सकते, इसका समाधान तो उन जैसा कोई सरस्वती पुत्र ही करेगा। यदि धन की कोई समस्या हो तो राजा उसका समाधान कर सकते हैं। इस पर नागेश भट्ट ने कहा कि इस प्रकार के प्रश्न हमारी पत्नी से करें। इस पर पत्नी ने कहा हमारे घर में एक घट धान्य है जो एक मास पर्यंत चलेगा। इसलिए धन-धान्य दोनों की जरूरत नहीं है। इस प्रकार की बात सुनकर श्रृंगवेरपुर के राजा राम सिंह ने आचार्य नागेश से गुरु दीक्षा ग्रहण व्यवस्थित रूप से प्रति मास ₹100 की वृत्ति प्रदान किया। साथ ही साथ उनके द्वारा लिखित समस्त रचना का मुद्रण कार्य भी करवाया ।
9.नाविक का कहा, विद्वान ने अमल किया
आप कल्पना करें कि आप किसी उलझन में हैं, दुविधा में हैं अथवा करियर के संकट से जूझ हैं तो अमूमन आप किनकी बात सुनेंगे? जिन्हें आप खुद से श्रेष्ठ समझते हैं, चाहे वह ज्ञान में आपसे श्रेष्ठ हो या फिर बुद्धिमत्ता में या फिर अनुभव में क्योंकि हमारे दिमाग में एक तरह की उच्च -नीच एक पदानुक्रम है, एक हाईयार्की है पर महान वैयाकरणिक नागेश भट्ट के जीवन की यह गाथा कुछ और ही कहती है। उन्होंने अपने करियर का एक अहम फैसला एक नाविक के टोकने मात्र से बदल दिया। ऐसा करने के लिए चाहिए क्या ?ऐसा करने के लिए विद्वत्ता या उम्र नहीं एक ग्रहणशील मन चाहिए जो की नागेश भट्ट के पास था।
कहानी यह है कि वैयाकरणिक नागेश भट्ट, विद्वानों की नगरी काशी में रहकर शास्त्रों की रचना किया करते थे। इस क्रम में वैयाकरणिक नागेश भट्ट घर चलाने लायक पैसा भी नहीं जुटा पाते थे।रूपए -पैसे के अभाव में उन्होंने सोचा कि काशी से बाहर जाकर कुछ पैसा कमाया जाए। सो नागेश भट्ट ने अर्थ कमाने की दृष्टि से एक दिन तैयार होकर गंगा पार जाने के लिए नौका चलने वाले नाविक को बुलाकर कहा, “नाविक! मैं एक निर्धन व्यक्ति हूं इसलिए तुमको उतराई नहीं दे सकता। कृपा करके मुझे गंगा पार करा दीजिए। आचार्य नागेश की यह बात सुनकर नाविक ने कहा, “अरे! आप तो महान विद्वान नागेश भट्ट हैं । आप काशी छोड़कर कहां जा रहे हैं? काशी में रहकर ही अध्ययन कीजिए। आपको कहीं और जाने की जरूरत नहीं है ।”नाविक की इस बात को सुनने के बाद नागेश भट्ट लज्जित हुए और लौट आए फिर से काशी। इसके बाद उन्होंने अनेक की शास्त्रों की रचना की।
10.ज्ञान संसार का सन्यासीः
चलिए एक स्थिति की कल्पना करते हैं। आपको अगर यह मालूम चले कि राष्ट्रीय स्तर पर या राज्य स्तर पर एक बहुत बड़ा समागम हो रहा हो ।समागम ऐसा हो कि जिसमें हर तरह के लोग भाग ले रहें हों, देश के सारे महत्वपूर्ण लोग इकट्ठे हो रहे हो -नामधारी साहित्यकार, कलाकार यानि जो भी जिस क्षेत्र का श्रेष्ठतम है वो सभी के सभी उस समागम में उपस्थित हो रहे हों,उसपर भी यह कि वह समागम ऐसा हो जिसका आयोजन 6 महीने – साल में या वर्ष- दो वर्ष, पांच वर्ष में न होता हो बल्कि वह ऐसा समागम हो है जिसके आयोजन करने की क्षमता वाले लोग कभी कभार ही होते हों और ऐसी क्षमता वाले लोग कभी -कभार ही इस दुनिया में उपजते हों, एक ऐसा आयोजन जिसमें जाने से ,भाग लेने से आपका समाजिक ओहदा, रूतबा, रसूख और आर्थिक स्तर ऊंचा,बहुत ऊंचा होने वाला हो तो ऐसी स्थिति में आप क्या करेंगे ? जबकि उस समागम में शामिल होने का न्योता भी आपको सम्मान के साथ मिला हो। आप जाएंगे या नहीं जाएंगे इस समागम में? सामान्य तौर पर आप कहेंगे कि हां! शामिल होंगे । पर नागेश भट्ट की कथा कुछ और ही कहती हैं।
सन 1742 की घटना है। जयपुर के महाराज श्री जयसिंह ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया उस यज्ञ में आचार्य नागेश भट्ट को सम्मान आमंत्रित किया , किंतु शास्त्रसाधना में लीन होने की वजह से वैयाकरणिक नागेश भट्ट ने क्षेत्र संन्यास ले लिया था क्षेत्र संन्यास बोले तो चुनी हुई जगह से बाहर न निकलने की कसम। इसी कारण वो जयपुर में होने वाले अश्वमेध यज्ञ में नहीं गए। आप जानते ही होंगे कि अश्वमेध यज्ञ उस समय के समाज में, राजनीति में ,अपना कितना महत्व रखता था। आपने महाकाव्य में इसकी चर्चा जरूर सुनी होगी। आज के समय में जब विद्वान बहुत छोटे-छोटे भौतिक लाभ के लिए अपनी शास्त्रसाधना तो क्या, अपने ज्ञान के सरोकारों को भी पलट देने के लिए तैयार मिलते हैं नागेश भट्ट की कथा किसी और लोक की कथा जैसी लगती है।
11.ज्ञान में महर्षि दधीचि हो जाना
अपने महर्षि दधीचि की कथा तो सुनी ही होगी! जब राक्षसों और देवताओं में युद्ध चल रहा था और देवता किसी तरह से राक्षसों को काबू करने में सफल नहीं हो रहे थे। ऐसी स्थिति में राक्षसों पर काबू पाने के लिए किसी असरदार शस्त्र का दरकार था। ऐसे में देवताओं ने महर्षि दधीचि से आग्रह किया कि उनके शरीर की हड्डियों से अस्त्र बनाने पर वो राक्षसों को हराने में कामयाब हो पाएंगे। देवताओं का ऐसा मंतव्य सुनकर महर्षि दधीचि ने अपना शरीर त्याग दिया ताकि देवता उनकी हड्डियों से अस्त्र बना सकें ।उनके शरीर त्याग करने के बाद, उनकी हड्डियों से जो हथियार बना वह वज्र कहलाया।वज्र, देवाताओं के राजा कहे जाने वाले इंद्र का प्रधान विजेता हथियार माना जाता है ।पर वैयाकरणिक नागेश भट्ट ने ज्ञान के लिए अपना शरीर होम कर दिया। इस प्रकार हम कह सकते है कि नागेश भट्ट ने ज्ञान के लिए अलग किस्म से देह दान किया। संज्ञान में आ रहा होगा कि है वैयाकरणिक नागेश भट्ट का बचपन 16 बरस की आयु तक गाय चराने और मलयुद्ध यानी कुश्ती- पहलवानी करने में बीता था। कहते हैं उससे उनका शरीर बहुत मजबूत और सौष्ठवपूर्ण था पर निरंतर शास्त्रों की साधना करने की वजह से शरीर उपेक्षित होता चला गया, जिसका परिणाम यह निकला कि उनका शरीर दुर्बल होता चला गया और उनके पीठ में एक बड़ा कुबड निकल गया। परंतु ,उस कुब्ज की परवाह किए बगैर, कष्ट सहते हुए नागेश भट्ट शास्त्रों की रचना में लगे रहे । कुब्ज निकल जाने से उन्हें बैठने में तकलीफ़ होती थी।पर रचना के लिए लंबे समय तक बैठना पड़ता था, और कुब्ज के कारण वो सहारा भी नहीं ले पाते थे।ऐसे में उन्होंने एक तरकीब निकाली। वे जहां वैठते थे वहां की दीवार में उन्होंने कुबड़ के आकार का एक छेद कर दिया। नागेश भट्ट इसी छेद में अपने कुबड़ को फिट करके, दीवार के सहारे बैठकर रचना करते थे। नागेश भट्ट कि यह कहानी है आज ऐसा लगता है किसी और लोग की कहानी। भला ऐसे लोग कहां मिलते हैं जो बिना किसी प्रयोजन के, , जो बिना किसी भौतिक लाभ के, बिना किसी प्रतिष्ठा के लालच के, बिना किसी पद की लालसा के ज्ञान के लिए, शास्त्र रचना के लिए अपने शरीर को होम कर दें । पर हमारे पुरखों का इतिहास यह बतलाता है कि हमारे बीच ज्ञान के ऐसे दीवाने भी रहे हैं जो आदर्श से प्रेरित होकर ज्ञान की रचना में लगे रहे। ऐसी कल्पना, ऐसे धरातल पर जाकर जीवन जीना, आज कितना असंभव सा लगता है। ऐसा लगता है कि भौतिक जीवन की धरातल से हटकर, एक अलग स्तर पर, एक अलग धरातल पर जीने की जो हमारी क्षमता थी वह अब विलुप्त होने के कगार पर है। नागेश भट्ट की यह कथा हमें इसी गायब होते हुए, विलुप्त होते हुए मानवीय जीवन के धरातल की याद दिलाती है।
12.ज्ञान की अनेक परंपराओं के साधक:
आप देख रहे होंगे, समझ भी रहे होंगे और अनुभव भी होगा कि आज के समय में किसी एक शास्त्र में ही पारंगत होना, उसपर महारत हासिल करने की घटना कितना दुर्लभ होता जा रहा है। ऐसे में आप कल्पना कीजिए कि एक ऐसा व्यक्ति जिन्होंने ज्ञान की अनेक परंपराओं में न केवल महारत हासिल किया बल्कि, ज्ञान की अनेक परंपराओं में अनेकों श्रेष्ठ ग्रंथ लिखे। और पता है ऐसा करने वाले का नाम क्या है ? उस शख्सियत का नाम है वैयाकरणिक नागेश भट्ट। व्याकरण शास्त्र, साहित्य शास्त्र ,धर्मशास्त्र, तर्कशास्त्र, वेद व्याख्यान ,वेदांत संबंधी ग्रंथ ,संख्यशास्त्र ,योगशास्त्र, तंत्र शास्त्र, पुराण संबंधी ग्रंथ इसके उदाहरण हैं ।ऐसा नहीं है वैयाकरणिक नागेश भट्ट ने ज्ञान की इन परंपराओं में एक-एक ग्रंथ की रचना की बल्कि ज्ञान की इन अलग-अलग परंपराओं में अनेक ग्रन्थों की रचना की। जैसे व्याकरणशास्त्र में 2०,साहित्यशास्त्र में 9, धर्मशास्त्र में 22, तर्कशास्त्र में दो, वेद व्याख्यान में दो, वेदांत संबंधी ग्रंथ एक, सांख्य शास्त्र में एक, योग शास्त्र में दो, तंत्रशास्त्र में चार ,और पुराण संबंधी ग्रंथ दो ग्रन्थों की रचना की।
कुछ प्रमुख रचनाएं:
1. लघुशब्देन्दुशेखर
2. वृहच्छब्देन्दुशेखर
3.स्फोटवाद
4 वैयाकरणसिद्धांतमन्जूषा
-इसे व्याकरण-दर्शन का शिखर-ग्रंथ माना जाता है।
अध्याय विवरण
1.अपमानित चरवाहा बना महापंडित
2.हर होनहार के होत न चिकने पात
3.घोर अपमान का साकारात्मक उर्जा में तब्दीली
4. प्रतिज्ञा-या फिर महा पंडित या फिर मृत्यु
5.ताकत के लिए नहीं ज्ञान के लिए तपस्या
6.नागेश भट्ट की रचनास्थली
7.अध्ययन के लिए चाव और मेहनत
8.दरिद्रता के आगे ज्ञान की जीत
9.नाविक का कहा विद्वान ने माना
10. अश्वमेघ का आमंत्रण ठुकराया-ज्ञान में तल्लीन रहा
11.ज्ञान के लिए देह दान
12.एक नहीं,ज्ञान की अनेका-एक परंपराओं का साधक
13.व्यक्ति एक ग्रंथ अनेक
14.आखिर में
1.अपमानित चरवाहा बना महापंडित Humiliated Shepherd Turned Scholar
2.हर होनहार के होत न चिकने पात
Talent Doesn’t Ensure Smooth Paths
3.घोर अपमान का साकारात्मक उर्जा में तब्दीली — Turning Humiliation into Strength
4.प्रतिज्ञा-या फिर महा पंडित या फिर मृत्यु — Vow: Scholar or Live the Body
5.ताकत के लिए नहीं ज्ञान के लिए तपस्या — Asceticism for Wisdom
6.नागेश भट्ट की रचनास्थली — Nagesh Bhatt’s Workshop
7.अध्ययन के लिए चाव और मेहनत — Zeal and Hard Study
8.दरिद्रता के आगे ज्ञान की जीत — Knowledge Triumphs Over Poverty
9.नाविक का कहा विद्वान ने माना — The Scholar Heeded the Sailor
10.अश्वमेघ का आमंत्रण ठुकराया-ज्ञान में तल्लीन रहा — Declined Ashvamedha, Chose Study
11.ज्ञान के लिए देह दान — Offering the Body for Knowledge
12.एक नहीं,ज्ञान की अनेका-एक परंपराओं का साधक — Master of Many KnowledgeTraditions
13.व्यक्ति एक ग्रंथ अनेक — One Man, Many Texts
14.आखिर में — In Conclusion