हंस पत्रिका – अगस्त 2025 अंक
🌿 छोड़ना
पर, कुछ इस तरह छोड़ना
जैसे छोड़ता है पेड़ पत्तियाँ, पतझड़ में
नई पत्तियों के लिए जगह बनाते हुए.
🛠️ छोड़ना
पर, कुछ इस तरह छोड़ना
जैसे छोड़ता है मजदूर अपना गात
मेहनत से अपनी छाती निचुड़ने के बाद.
🍈 छोड़ना
पर, कुछ इस तरह छोड़ना
जैसे छोड़ता है खरबूज अपना बंध
रस से भर जाने के बाद,महमहाते हुए.
🏚️ छोड़ना
पर, उस तरह नहीं
जैसे पुराने मकान से
चाहे गए मकान में शिफ्ट करते वक्त
छोड़ दिया जाता है
पौधा लगा कोई अनाकर्षक गमला,
जैसे छोड़ दिया जाता है
देवता का पुराना-धुराना कैलेंडर,
जैसे छोड़ दिया जाता है
कोना झडा चाय का कप.
🌆 छोड़ना
पर, उस तरह नहीं
जैसे छोड़ रहा है शहर
अपने मजदूरों को अपनी मौत मरने के लिए
सड़क, ट्रक – ट्रेन के हवाले
भूख और बीमारी के हवाले.
🕊️ छोड़ना
पर, उस तरह नहीं
जैसे छोड़ा था सीता को, राम ने
लोकहित के नाम पर ,मढ़ते हुए लांछन
छोड़ने को पवित्र परित्याग; बनाते हुए
✍️ — कवि : प्रो. राघवेन्द्र प्रपन्न, प्रोफेसर,दिल्ली विश्वविद्यालय.
